उत्तराखंड की पवित्र धरती पर अलकनंदा नदी के बीच एक छोटे से टापू पर विराजमान माँ धारी देवी का मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। यह मंदिर पौड़ी गढ़वाल जिले में श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के बीच कलियासौड़ क्षेत्र में स्थित है। माना जाता है कि माँ धारी देवी उत्तराखंड के चार धाम – बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री – की रक्षक देवी हैं।
यह शक्तिपीठ देवी काली को समर्पित है और 108 शक्तिस्थलों में से एक माना जाता है। मंदिर की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहाँ देवी की मूर्ति का केवल ऊपरी भाग (धड़) स्थापित है, जबकि निचला भाग कालीमठ में पूजित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार माँ दिन में तीन रूप बदलती हैं – सुबह कन्या, दोपहर में युवती और शाम को वृद्धा के रूप में दर्शन देती हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार एक भीषण बाढ़ में बहकर आई देवी की मूर्ति धरो गाँव के पास एक चट्टान में अटक गई थी। ग्रामीणों ने दिव्य संकेत पाकर उसी स्थान पर मंदिर स्थापित किया। वर्षों तक मूर्ति खुले आसमान के नीचे एक ऊँची चट्टान पर विराजमान रही।
16 जून 2013 को मंदिर की मूर्ति को मूल स्थान से हटाकर ऊँचे प्लेटफॉर्म पर स्थापित किया गया। उसी रात उत्तराखंड में भीषण आपदा आई। हजारों लोगों की जान गई। कई श्रद्धालु इसे माँ के स्थान परिवर्तन से जोड़कर देखते हैं। बाद में पुनः विधिवत स्थापना की गई और आज मंदिर सुरक्षित ढांचे में स्थित है।
नवरात्र के अवसर पर यहाँ विशेष पूजा और भव्य आयोजन होते हैं। मंदिर तक श्रीनगर (गढ़वाल) से बस और टैक्सी आसानी से मिल जाती है। अलकनंदा किनारे तक सीमेंट मार्ग बना है, जिससे श्रद्धालु सुविधापूर्वक पहुँचते हैं। पास में एक प्राचीन गुफा भी दर्शनीय है।
धारी देवी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आस्था, संस्कृति और विश्वास की जीवित पहचान है।

